क्यूँ खुद में खो जाते हैं ?
है संसार अथाह और निर्माता अनंत!
लक्ष्य था जानू इन सबको और देखू उस अनंत का छोर,
पर जीवन के रास्तों पर ये लक्ष्य कहीं मिट जाते हैं,
ये है सिर्फ मेरे साथ या सब खुद में खो जाते हैं ?
मानव ही है परिभाषा जीवन के विस्तारों की,
वरना पशु ही रहते हम, ना होती छमता विचारों की,
फिर क्यूँ सब पाकर भी हम इतना संकुचित हो जाते हैं?
ये है सिर्फ मेरे साथ या सब खुद में खो जाते हैं ?
कहते हैं उसकी इक्षा से संसार ये सारा चलता है,
फिर क्यूँ वो अपनी रचना को, खुद से दूर ही रखता है,
ये प्रश्न है मेरा उस से, जो हर कण-कण में बसते हैं ,
हम क्यूँ खुद में खो जाते हैं, हम क्यूँ खुद में खो जाते हैं ?
#1 by shweta on May 28th, 2011
Quote
good
#2 by Rashmi on September 23rd, 2011
Quote
Gud one and true one…..