पेट तुम बढे चलो
वेट तुम बढे चलो
सांस में मजा रहे
स्वाद रस बना रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
और गज कभी हिले नहीं
बीमारी का पहाड़ हो
या उम्र की पुकार हो
तुम निडर हटो नहीं
तुम निडर डटो वहीँ
पेट तुम बढे चलो
वेट तुम बढे चलो
प्रात हो की रात हो
बस भोजनों की बात हो
कोई संग हो न साथ हो
न चवन्निया भी हाथ हों
अर्जुन की भाँती लडदुओ में लक्ष्य देखते रहो
और पेट तुम बढे चलो
वेट तुम बढे चलो
सांस में मजा रहे
स्वाद रस बना रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
और गज कभी हिले नहीं
#1 by shiyong on October 18th, 2011
Quote
可惜我不懂印度文字啊。 想不到现在还流行写诗。
在中国古代,曾经有唐诗,宋词,元曲…