Archive for category Poems

Intro-inspection (कभी खुद में !)

क्या खूब तमाशा होता है , तुमने पैसा फेंका क्या ?
जो दूसरो में खोजते हो, उसको खुद में कभी देखा क्या ?
क्या खूब तमाशा होता है , तुमने पैसा फेंका क्या ?

सब थक गए हैं चलते चलते, इतने कांटे रास्तो पर थे,(२)
कितने कांटे रस्ते पर तुमने बोये कभी सोचा क्या ?
क्या खूब तमाशा होता है , तुमने पैसा फेंका क्या ?

जब देख देख कर आँख थकी और बंद हुई तब ये देखा (२)
मन के सारे काले चेहरों में वो अंतिम चेहरा मेरा था क्या ?
क्या खूब तमाशा होता है, तुमने पैसा फेंका क्या ?
जो दूसरो में खोजते हो, उसको खुद में कभी देखा क्या ?

Hey Prabhu !!

हे प्रभु तू मन को हर ले !!
अपने विवेक से मैंने जैसा जीवन चाहा,
अपने कर्मो से उस जीवन को ख़ाक बनाया.
वो कर्म ही क्या जो जीवन का उद्धार ना कर ले,
इसलिए, हे प्रभु तू मन को हर ले !!

मानव बनने का मतलब क्या, जब पशुता मन पर व्यापित हो,
मेरे हर कर्म से मेरा निहित स्वार्थ सत्यापित हो.
इससे पहले पशुता मन पर अपना घर कर ले ,
हे प्रभु तू मन को हर ले!!

हर बोझ से भारी है ये मन का भार,
हर जीत के बाद सताती इसको हार.
मन की ये गति जीवन का कहीं वेग ना हर ले,
इस से पहले, हे प्रभु तू मन को हर ले!!

मोक्क्ष (Global Minima)

कौन निकाले इन फंदों से जीवन जैसे Local minima!
कुछ संत बने भभूत रमा कर , कुछ चरण पूज सिन्दूर सजा कर,
अपने अपने पथ पर जा सब खोज रहे हैं Global minima,
कौन निकाले इन फंदों से जीवन जैसे Local minima, !!

वो बैठा है सागर गर्भ में, वो है पत्थर में कण कण में,
सब अलग अलग हैं मार्ग बताते, क्या कोई जाने उसकी सीमा ?
कौन निकाले इन फंदों से जीवन जैसे Local minima,
अपने अपने पथ पर जा सब खोज रहे हैं Global minima!!

सत्य है क्या मस्तिष्क ना जाने, पर हृदय सत्य बतलाता है,
पर कर्म विवश मस्तिष्क के हाथो, हृदय मंद मुस्काता है.
इन दोनों के अथक युद्ध से, हम सीख रहे हैं जीवन जीना,
कौन निकाले इन फंदों से जीवन जैसे Local minima,
अपने अपने पथ पर जा सब खोज रहे हैं Global minima!!

क्यूंकि रक्त तो दौडेगा !!

शब्द चले तीर से, पर लक्ष्य से परे रहे,
कर्म के परिणाम सब प्रत्यक्ष से परे रहे !
शब्दभेदी बाडों से सत्य कौन भेदेगा ?
रक्त ना होने दो सफ़ेद , क्यूंकि रक्त तो दौडेगा !!

रक्त नहीं जीवन सिर्फ, वह एक विचारधारा है,
वर्ना तो रंग एक था, ये विचारों का खेल सारा है
आचरण न रहे तो रक्त क्या रह जायेगा, लाल रंग युहीं कभी श्वेत सा हो जायेगा !
फिर ये जीवन क्या रहेगा, मन किस्से मोह जोडेगा ?
रक्त ना होने दो सफ़ेद , क्यूंकि रक्त तो दौडेगा !!

उठा तीर और भेद दे की सब विचार एक हो
और बने तू ऐसा तूफ़ान की सब दिशाएं नेक हो
मत सोच वो आयेगा खुद, और जीवन प्रवाह मोड़ेगा !
रक्त ना होने दो सफ़ेद , क्यूंकि रक्त तो दौडेगा !!

ऊडता रहा मैं !!

उड़ता रहा उस दीप को छूने की सिर्फ आस में,
पंख थे थक गए और कंठ सूखा प्यास में.
पर अथक मेहनत से आकाश सारा हिल गया,
दीप छूने मैं चला और सूर्य मुझको मिल गया !!

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