क्यूँ खुद में खो जाते हैं ?
है संसार अथाह और निर्माता अनंत!
लक्ष्य था जानू इन सबको और देखू उस अनंत का छोर,
पर जीवन के रास्तों पर ये लक्ष्य कहीं मिट जाते हैं,
ये है सिर्फ मेरे साथ या सब खुद में खो जाते हैं ?
मानव ही है परिभाषा जीवन के विस्तारों की,
वरना पशु ही रहते हम, ना होती छमता विचारों की,
फिर क्यूँ सब पाकर भी हम इतना संकुचित हो जाते हैं?
ये है सिर्फ मेरे साथ या सब खुद में खो जाते हैं ?
कहते हैं उसकी इक्षा से संसार ये सारा चलता है,
फिर क्यूँ वो अपनी रचना को, खुद से दूर ही रखता है,
ये प्रश्न है मेरा उस से, जो हर कण-कण में बसते हैं ,
हम क्यूँ खुद में खो जाते हैं, हम क्यूँ खुद में खो जाते हैं ?